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Reelsसास को बहू के वेतन का 25% हिस्सा मिलेगा: राजस्थान हाईकोर्ट। Shri Choth Mal Verma and Anr. v Ajmer Vidyut Vitran Nigam Limited and Ors. On 17/09/2026.
25 Sept 2026
Reelsपत्नी द्वारा पति को ‘सांवला’ (black complexioned) या ‘मोटा’ (fatty shaped) कहना अपने आप में तलाक का पर्याप्त आधार नहीं है अगर सबूत नहीं है तो: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट। Akash Ghosh v. Smt. Pooja Seet [FA(MAT) No. 325 of 2024] On 18/09/2026.
24 Sept 2026
Reels18 वर्ष से अधिक आयु (वयस्क) का संतान अपने पिता से भरण-पोषण (Maintenance) का दावा कर सकता है, यदि वह शारीरिक या मानसिक विकलांगता के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है: कलकत्ता हाईकोर्ट। Samit Pramanick v. State of West Bengal & Ors., CRR 534 of 2023, on 21/09/2026.
24 Sept 2026
Posts“चलते रहो, मंज़िल खुद बोलेगी।”
24 Sept 2026
Posts“हर केस के पीछे कड़ी मेहनत” और “हर कोर्ट एक नया सफर” —कानून के साथ, हौसले के साथ।
23 Sept 2026
Reelsपैसे की बरामदगी काफी नहीं है; रिश्वत की मांग (Demand of Bribe) का पुख्ता सबूत होना अनिवार्य है: सर्वोच्च न्यायालय। Jaswinder Singh (Dead Through LRs) v State of Punjab, On 22/09/2026.
23 Sept 2026
Reelsरेलवे क्लेम। N. Sri Rama Prasad and another v. Union of India, Case No.: C.M.A. No. 159 of 2021, On 11/09/2026.
22 Sept 2026
Reelsमकान-मालिक के साथ बिक्री का समझौता करने से किरायेदारी खत्म नहीं होती और न ही किरायेदार का कब्ज़ा ‘पार्ट परफॉर्मेंस’ में बदलता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट। Rajesh Kumar Chaurasia v. Suresh Kapoor, On 07/09/2026.
21 Sept 2026
Reelsसिर्फ़ आर्थिक तंगी वैवाहिक मामला ट्रांसफर करने का आधार नहीं हो सकती; पति पत्नी के यात्रा का खर्च उठा सकता है: राजस्थान हाईकोर्ट। S v T, On 09/09/2026.
21 Sept 2026
Reelsसड़क किनारे खड़े हुए वाहन को स्वतः ही दुर्घटना के लिए दोषी नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब पीछे से आने वाले चालक की अपनी गलती स्पष्ट हो। Union of India v. Md. Ismail & Ors. MAC Appeal No. 147/2014, On 18/08/2026.
21 Sept 2026
ReelsS.144 BNSS | विवादित वैवाहिक रिश्ते के लिए ट्रायल में सबूत की ज़रूरत: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने गुज़ारा-भत्ता की कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया। Shri Suraj Chetry v. Smti. Nayanmoni Choudhury, 21/08/2026.
21 Sept 2026
ReelsMACT कोर्ट को मुआवजा पाने वाले claimants (दावाकर्ताओं) की ज़रूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक होना चाहिए तथा अनावश्यक रूप से एफडी (FDR) से पैसे निकालने पर रोक नहीं लगानी चाहिए। SANJAY SACHDEVA v. BHOLA MAHATO & ORS (M/S RELIANCE GENERAL INSRUANCE CO LTD) On 16/09/2026.
20 Sept 2026
Reelsक्योंकि आरोपी अपराध के समय नाबालिग (Juvenile) था इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को एक अहम फैसले में 21 साल पुरानी सजा को रद्द कर दिया। Mahavir @ Avnish v State of Madhya Pradesh.
10 Sept 2026
ReelsCJP Protest: छात्र को नोटिस जारी करने वाले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सस्पेंड।
10 Sept 2026
ReelsSpecific Performance (अनुबंध के पालन) के मुकदमे में वादी को सबसे पहले संदिग्ध हालात को स्पष्ट करना होगा: सुप्रीम कोर्ट। Bohar Singh & Anr. Versus Sardara Singh & Ors. On 31/08/2026
10 Sept 2026
ReelsNDPS Act में ज़ब्त गाड़ी को ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी ट्रायल कोर्ट के आदेश के बिना डिस्पोज़ नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट। R. Manimaran v State of Tamil Nadu, on 24/08/2026.
9 Sept 2026
Reelsशादी से इनकार करने पर 7 साल के आपसी सहमति वाले रिश्ते को रेप नहीं माना जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट। Lalu Mahtha @ Lalu Mahta v. State of Jharkhand and Anr. On 29/08/2026.
9 Sept 2026
Reelsपति-पत्नी की तरह रहे हो: 498A IPC/ 85 BNS लगेगा: कलकत्ता हाईकोर्ट। SK. AZHARUDDIN @ AKASH -VS- STATE OF WEST BENGAL, On 02/09/2026.
8 Sept 2026
Reels'25 मुकदमे दर्ज हों तो भी जमानत से इनकार नहीं', पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चोरी के आरोपी को दी जमानत। Amrik Singh VS. State of Haryana, on 24/08/2026.
8 Sept 2026
Reelsसीनियर सिटीज़न एक्ट का इस्तेमाल बहू को बेदखल करने या अदालती आदेशों को तोड़ने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट। Devba Pauladsing Girase vs Kavita Himmatsing Girase & others, on 13/08/2026.
8 Sept 2026
Reelsबच्चों की कस्टडी केस में माता-पिता का साइक्लोजिकल टेस्ट पहले: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि बच्चों का टेस्ट कराने से पहले माता-पिता की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। S VS. N WRIT PETITION NO. 15549 OF 2026 (GM-FC), On 07/08/2026.
8 Sept 2026
Reelsरेल में शराब पीकर यात्रा करना या स्टेशन पर पीकर आना। केरल हाईकोर्ट ने रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 145(a) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है और इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। K.N. Shastry v. Union of India, on 29/07/2026
7 Sept 2026
Reelsहाईकोर्ट अंडर आर्टिकल 226 किसी प्राधिकारी, ट्रिब्यूनल या अधीनस्थ न्यायालय के अवैध आदेश या निर्णय को रद्द (quash) कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट। Yadvendra Singh VS. Union of India, on 06/08/2026.
6 Sept 2026
ReelsDNA टेस्ट रेप का सबूत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट। इससे ये साबित नहीं होता कि संबंध सहमति से बने थे या जबरदस्ती। KXXXXX v. THE STATE GOVT. OF NCT OF DELHI, On 03/09/26.
5 Sept 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट 4 मई 2026 ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल लापरवाही (Medical Negligence) के मामलों में, डॉक्टर की मृत्यु के बाद भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत कार्रवाई बंद नहीं होगी। कानूनी उत्तराधिकारी (Legal Heirs) को प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है, लेकिन उनकी देयता (Liability) केवल डॉक्टर से विरासत में मिली संपत्ति (Inherited Estate) तक सीमित होगी। Kumud Lall VS. Suresh Chandra Roy (Dead) Through LRS; Supreme Court on 04/05/2026.
14 May 2026
Reelsकेरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि जोड़ा (couple) आपसी सहमति (mutual consent) से तलाक चाहता है, तो फैमिली कोर्ट केवल इस आधार पर याचिका खारिज नहीं कर सकता कि वे अलग रहने का कोई स्पष्ट या ठोस कारण नहीं बता रहे हैं। यह निर्णय आपसी सहमति से तलाक के मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा को मान्यता देता है। Dyna Scaria @ Thresiamma VS. Vernin Varkey@ John; Kerala High Court on 31/03/2026.
14 May 2026
Reels7 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में 22 साल से जेल में बंद कैदी, को जमानत दी और ओडिशा हाईकोर्ट के 2016 के आदेश को “बहुत परेशान करने वाला” (Very Disturbing) बताया। हाईकोर्ट ने 3157 दिनों (लगभग 9 साल) की देरी के आधार पर अपील खारिज कर दी थी, जिसे SC ने गलत ठहराया। Arjun Jani@ Tuntun VS. State of Orissa; Supreme Court on 07/05/2026.
14 May 2026
Reelsकलकत्ता हाईकोर्ट ने UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के मामलों में भी लंबे समय तक विचारण (trial) में देरी होने पर, वैधानिक रोक (statutory bar) के बावजूद जमानत (bail) दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आरोपी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। Mansur Ali VS. State of West Bengal; Calcutta High Court on 05/05/2026.
14 May 2026
Reelsदिल्ली हाईकोर्ट ने 5 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि पति ने अदालत के आदेश के अनुसार पत्नी को मुकदमे का खर्च (Litigation Expenses) नहीं दिया है, तो वह पत्नी द्वारा लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने में देरी के आधार पर उसका डिफेंस (बचाव) बंद (Strike off) करने की मांग नहीं कर सकता। Mat. Appeal FC 63/26; Delhi High Court on 05/05/2026.
14 May 2026
Reelsपंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 29/04/2026 को अपने फैसले में कहा कि यदि दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो उनके कानूनी उत्तराधिकारी (जैसे भाई, बहन, या बच्चे) मुआवजा पाने के हकदार हैं, भले ही वे उस व्यक्ति की कमाई पर निर्भर न हों। Paramjit Singh @ Pammi VS. Jaspal Singh & Others; P&H High Court on 29/04/2026.
14 May 2026
ReelsKerala High Court ने स्पष्ट किया है कि स्पेशल मैरिज एक्ट (Special Marriage Act) के तहत भारतीय और विदेशी नागरिक के बीच विवाह के लिए दूतावास (Embassy) से NOC अनिवार्य नहीं है। Vinu Vikraman VS. State of Kerala; Kerala High Court on 05/05/2026.
13 May 2026
Reelsइलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 356 के तहत ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ (अनुपस्थिति में मुकदमा) के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया (Blueprint) तय की है, जो घोषित अपराधियों (Proclaimed Offenders) के खिलाफ कार्यवाही को सुव्यवस्थित करती है। यह प्रक्रिया ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ के तहत फरार अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाने, वीडियो रिकॉर्डिंग करने और राज्य की ओर से वकील (Amicus) नियुक्त करने की अनिवार्यताओं को रेखांकित करती है, ताकि न्याय में देरी न हो। Ravi @ Ravindra Singh VS. State of UP; Allahabad High Court on 05/05/2026.
13 May 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट 5 मई 2026 को,(न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ) ने NDPS एक्ट के तहत 22 किलोग्राम से अधिक गांजा रखने के आरोपी को जमानत दे दी। यह राहत केवल मुकदमे में देरी (trial delay) के आधार पर दी गई, क्योंकि आरोपी एक साल से अधिक समय से जेल में था और अभी तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ था। Rajadurai VS. State of Tamil Nadu; Supreme Court on 05/05/2026.
13 May 2026
Reelsसहमति से बने किशोर रिश्तों में POCSO केस जरूरत पड़ने पर रद्द हो सकते हैं: मेघालय हाईकोर्ट Shri Vicky Kharsati VS. State of Meghalaya on 23/04/2026.
13 May 2026
ReelsHigh Court के पास आपराधिक पुनरीक्षण (Revision) या अपील को सुनने से पहले दोषी को आत्मसमर्पण (Surrender) से छूट देने की शक्ति है या नहीं, यह एक अत्यंत विवादास्पद कानूनी मुद्दा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी बेंच (larger bench) को भेज दिया है। यह मुद्दा अब भी कानूनी बहस का विषय है, क्योंकि विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसले विरोधाभासी हैं। जैसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का मानना है कि इनहेरेंट शक्तियों का उपयोग करके विशेष परिस्थितियों में छूट दी जा सकती है। जबकि इसके विपरीत कुछ अदालतों जैसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना है कि बिना सरेंडर किए Revision/ Appeal सुनवाई योग्य नहीं है (not maintainable)। Sudhir Khaitan VS. State of Rajasthan; Supreme Court on 10/04/2026.
3 May 2026
Reelsजम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवजा (Interim Compensation) देना अनिवार्य नहीं, बल्कि विवेकाधीन (Discretionary) है। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट इसे यांत्रिक तरीके (Mechanically) से, बिना सोचे-समझे या केवल अर्जी आने पर आदेशित नहीं कर सकते। यह आदेश राकेश रंजन श्रीवास्तव बनाम झारखंड राज्य (2024) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करता है। Nargees Javaid VS. Ghulam Jeelani Nengroo; J&K&L High Court on 20/04/2026.
3 May 2026
Reelsमध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किशोर (juvenile) के रूप में छोटे-मोटे अपराध के लिए मिली सज़ा, डिफेंस सर्विसेज़ (सेना) में नौकरी पाने में बाधा नहीं बन सकती है। कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 24 का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग के रूप में पिछली सज़ा के आधार पर उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इसका उद्देश्य उसे समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है। Union of India VS. Pushpraj Singh; MP High Court on 15/04/2026.
3 May 2026
Reelsकेरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दीवानी मामले (Civil Suit) में समझौता डिक्री (Compromise Decree) अपने आप निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 (Section 138 NI Act) के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द या बंद नहीं करती है। यदि आरोपी समझौते की शर्तों का पालन करने में विफल रहता है, तो क्रिमिनल केस जारी रहेगा। Noushad VS. State of Kerala; Kerala High Court on 10/02/2026.
2 May 2026
Reelsकर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आपराधिक कार्यवाही पर रोक (Stay) के बावजूद लुकआउट सर्कुलर (LOC) को जारी रखना आरोपी के विदेश में काम करने के जीविकोपार्जन के अधिकार (Right to Livelihood) का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि जब FIR/कार्यवाही रुकी हो, तो पुलिस को LOC वापस लेनी चाहिए या उसे रद्द (Recall) करना चाहिए। Mohammed Ashiq VS. Union of India in WP No. 6111 of 2026; Karnataka High Court On 27/03/2026.
2 May 2026
Reelsकेरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई आरोपी चेक बाउंस के मामले में अपना दोष स्वीकार (Pleaded Guilty) करता है, तो वह बाद में सजा को चुनौती नहीं दे सकता। Yahya Khan VS. Sainaba T.P; Kerala High Court on 16/02/2026.
2 May 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट ने 16/04/2026 को स्पष्ट किया है कि अपीलीय अदालत (Appellate Court) आरोपी द्वारा अपील न किए जाने पर भी उसकी दोषसिद्धि (Conviction) को पलट, संशोधित या परिवर्तित कर सकती है। न्यायालय ने कहा कि प्रक्रियात्मक तकनीकी के बजाय न्याय के हित (Interests of Justice) सर्वोपरि हैं और अदालत के पास u/s 386 Crpc/ 427 BNSS के निचली अदालत के निष्कर्षों की जांच करने की अंतर्निहित शक्ति है। State of Assam VS. Moinul Haque@ Monu; Supreme Court On 16/04/2026.
2 May 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निजी शिकायत मामलों (Private Complaint Cases) में, मजिस्ट्रेट द्वारा समन (Summons) के साथ गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant - NBW) जारी किए बिना पुलिस आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती। समन का मतलब केवल उपस्थिति दर्ज कराना है, न कि गिरफ्तारी। Om Prakash Chhawnika VS. State of Jharkhand; Supreme Court on 23/04/2026.
1 May 2026
Reelsआंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्तियां (Compassionate Jobs) बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों को कुचल रही हैं। कोर्ट ने चिंता जताई कि वर्ष 2014 से अब तक 20,801 अनुकंपा नियुक्तियां दी गईं, यानी लगभग हर साल 2,000 नौकरियां, जो कई बार नियमित भर्तियों से भी ज्यादा हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर नई गाइडलाइन बनाने का निर्देश दिया। इसमें निम्न बिंदुओं पर विचार करने को कहा गया: परिवार की आर्थिक स्थिति, नौकरी की जगह आर्थिक सहायता (Ex-gratia), कुछ मामलों में स्थायी नौकरी की बजाय अस्थायी/आउटसोर्सिंग नौकरी। Gogutattu Sujana VS. State of Andhra Pradesh; AP High Court on 08/04/2026.
1 May 2026
Reelsगुजरात हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुबंध के विशिष्ट अनुपालन (Specific Performance) के मुकदमे में, वादी (Plaintiff) पर यह साबित करने की जिम्मेदारी (Onus) है कि वह अनुबंध के तहत अपने हिस्से के कर्तव्यों को पूरा करने के लिए लगातार तैयार और इच्छुक (Continuous Readiness & Willingness) रहा है। यह अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 16(c) के तहत एक अनिवार्य शर्त है, न कि केवल दावों में एक औपचारिकता। निष्कर्ष: सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि वादी तैयार था। उसे साक्ष्यों (Evidence) के माध्यम से यह साबित करना होगा कि वह शुरू से अंत तक अपने वादे को पूरा करने में सक्षम था। Miskinbanu Jahidkhan Pathan VS. Alisher Subhanali Ansari; Gujarat High Court on 23/04/2026.
1 May 2026
ReelsMaintenance/ खर्चा देना पड़ेगा चाहे पति स्टूडेंट हो।
16 Apr 2026
Reelsमद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल हेलमेट न पहनने (non-bearing of helmet) को दुर्घटना के लिए ‘योगदायी लापरवाही’ (contributory negligence) नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि हेलमेट न पहनने का दुर्घटना के साथ सीधा संबंध (direct nexus) था। फैसले के मुख्य बिंदु : सीधा संबंध अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन (जैसे हेलमेट न पहनना) स्वचालित रूप से दोषपूर्ण पक्ष (tortfeasor) को ‘योगदायी लापरवाही’ की दलील देने का अधिकार नहीं देता है। इसके लिए यह स्थापित करना आवश्यक है कि हेलमेट न पहनने का दुर्घटना से सीधा संबंध था। दुर्घटना का कारण बनाम चोट की गंभीरता: हेलमेट का उद्देश्य मुख्य रूप से सिर की चोटों की गंभीरता को कम करना या रोकना है। यह किसी भी तरह से दुर्घटना (collision) को होने से नहीं रोकता है। इसलिए, हेलमेट न पहनने को दुर्घटना का कारक नहीं माना जा सकता है। मामले की पृष्ठभूमि (मदुरै बेंच, 2026): जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की पीठ ने तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम (TNSTC) की अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 41 वर्षीय व्यक्ति (जो बिना हेलमेट के था और बस दुर्घटना में मारा गया) पर अधिक ‘योगदायी लापरवाही’ तय करने की मांग की गई थी। 93% लापरवाही बस चालक की: कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें दुर्घटना के लिए 93% लापरवाही बस चालक की मानी गई थी, क्योंकि बस लापरवाही से चलाई जा रही थी। निष्कर्ष: अगर दुर्घटना लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण हुई है (जैसे बस ने बाइक को टक्कर मारी), तो मृतक द्वारा हेलमेट न पहनने के बावजूद, मुआवजे में पूरी कटौती नहीं की जा सकती। हेलमेट न होना केवल चोट की गंभीरता बढ़ा सकता है, लेकिन दुर्घटना का कारण नहीं। The Managing Director VS. Mariyammal; Madras High Court on 06/04/2026.
ReelsMediation/ मध्यस्थता से कब पीछे हट सकते हैं? #law #videos #viralvideos #reelsinstagram #legal
15 Apr 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी ने सभी दावों (claims) के निपटारे (settlement) के बाद आपसी सहमति से तलाक के लिए सहमति दे दी है, तो बाद में कोई भी पक्ष इससे पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता (mediation) समझौते के बाद तलाक से मुकरना अनुचित है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु: सहमति वापस लेने पर रोक: यदि दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से तलाक के लिए समझौता किया है, तो वे बाद में अपनी सहमति वापस नहीं ले सकते, विशेषकर तब जब दूसरे पक्ष ने समझौते की शर्तें (जैसे पैसा या संपत्ति) पूरी कर दी हों। मध्यस्थता (Mediation) का सम्मान: कोर्ट द्वारा मान्य मध्यस्थता समझौते के तहत तलाक पर सहमति बनी है, तो उस समझौते का पालन करना अनिवार्य है। अनुच्छेद 142 का प्रयोग: सर्वोच्च न्यायालय ने जरूरत पड़ने पर अपने विशेषाधिकार (Article 142) का इस्तेमाल कर ऐसे मामलों में शादी को खत्म करने का आदेश दिया है, जहां समझौता हो चुका है। यह निर्णय उन मामलों के लिए एक कड़ा संदेश है जहां एक पक्ष समझौते के तहत लाभ लेने के बाद भी तलाक से मुकर जाता है। Dhananjay Rathi VS. Ruchika Rathi; Supreme Court on 13/04/2026.
14 Apr 2026
Reels138 NI Act. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ़ बोर्ड प्रस्ताव पर दस्तखत करने से यह साबित नहीं होता कि कोई डायरेक्टर कंपनी के रोज़मर्रा के मामलों का इंचार्ज था और उनके लिए ज़िम्मेदार था> इसलिए सिर्फ़ इस आधार पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कंपनी की डायरेक्टर की अपील मंज़ूर करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने चेक बाउंस मामले में उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। बेंच ने कहा कि ऐसा कोई खास आरोप शियाकायत में नहीं था जिससे यह साबित हो कि कंपनी के कामकाज में उनकी कोई सक्रिय भूमिका थी। मामले की पृष्ठभूमि यह मामला NI Act की धारा 138 और 142 के तहत शिकायत से जुड़ा है। कंपनी ने लोहा और स्टील के भुगतान के लिए तीन चेक जारी किए, जो इस आधार पर बाउंस हो गए कि चेक जारी करने वाले के दस्तखत अलग थे और चेक में कुछ बदलाव किए गए। इसके बाद एक कानूनी नोटिस भेजा गया और फिर मजिस्ट्रेट ने कंपनी और उसके डायरेक्टरों के खिलाफ समन जारी किए। अपीलकर्ता कंपनी की डायरेक्टरों में से एक थीं। उसने इस समन आदेश को चुनौती दी। रिविजनल कोर्ट और हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि बोर्ड प्रस्ताव पर उनके दस्तखत से यह पता चलता है कि वह कंपनी के रोज़मर्रा के मैनेजमेंट में शामिल थीं। सिर्फ़ डायरेक्टर होना या प्रस्ताव पर दस्तखत करना काफ़ी नहीं हाईकोर्ट का तर्क खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि NI Act की धारा 141 के तहत किसी डायरेक्टर की जवाबदेही तय करने के लिए यह खास तौर पर बताना ज़रूरी है कि संबंधित समय पर वह व्यक्ति कंपनी के कामकाज का इंचार्ज था और उसके लिए ज़िम्मेदार था। इस संदर्भ में N. Vijay Kumar बनाम Vishwanath Rao N. (2025 INSC 537), K.S. Mehta बनाम Morgan Securities & Credits (P) Ltd और Hitesh Verma बनाम Health Care at Home (India) (P) Ltd. मामलों में दिए गए फ़ैसलों का हवाला दिया गया। अदालत ने यह भी पाया कि शिकायत में अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ ऐसा कोई सीधा आरोप नहीं था कि वह कंपनी के कामकाज की प्रभारी थी, या उसके लिए ज़िम्मेदार थी। Case : Saroj Pandey v. Govt of NCT of Delhi; Supreme Court on 07/04/2026.
Reelsभारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि पत्नी कोई नौकरानी नहीं है, और इस बात पर जोर दिया कि विवाह एक समान साझेदारी है, न कि गुलामी का रिश्ता। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि पत्नी द्वारा खाना पकाने या घरेलू काम करने से इनकार करना क्रूरता या तलाक का वैध आधार नहीं है। मुख्य बिंदु: साझा जिम्मेदारी: अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों पति-पत्नी को खाना पकाने और सफाई सहित घरेलू कामों में योगदान देना चाहिए, न कि इसे पूरी तरह से महिला पर छोड़ देना चाहिए। क्रूरता नहीं: तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा कि पत्नी द्वारा सामान्य घरेलू कामों को न करना क्रूरता नहीं कहा जा सकता। बदलते समय: पीठ ने टिप्पणी की कि “समय बदल गया है” और पति-पत्नी को जीवन साथी के रूप में कार्य करना चाहिए, न कि स्वामी-सेवक के रूप में। संदर्भ: यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की गई थी जिसमें एक पति ने दावा किया था कि उसकी पत्नी ने घरेलू काम करने से इनकार कर दिया था, और इस धारणा को खारिज कर दिया था कि यह तलाक का आधार बनता है।
13 Apr 2026
Reelsकलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग सास-ससुर द्वारा अपनी बहू के साथ शारीरिक मारपीट करने का आरोप अत्यधिक अविश्वसनीय (improbable) है। अदालत ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड से शारीरिक अक्षमता (physical incapacity) साबित होने पर ऐसे 498A (दहेज उत्पीड़न) मामलों को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। मामले के मुख्य बिंदु (Key Highlights): संदर्भ: न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास की पीठ ने धारा 482 CrPC के तहत एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision petition) की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। मेडिकल सबूत: आरोपियों (ससुराल वालों) ने सर्जरी और बीमारी के मेडिकल दस्तावेज पेश किए, जिससे साबित हुआ कि वे उस अवधि के दौरान शारीरिक रूप से अक्षम थे। अदालत की टिप्पणी: अदालत ने माना कि सर्जरी के बाद ठीक हो रहे बुजुर्गों के लिए शारीरिक हमला करना “तर्क से परे” है और इसे “मानना असंभव” है। निर्णय: अदालत ने बुजुर्ग इन-लॉज़ के खिलाफ 498A (क्रूरता), 406 (विश्वासघात), 506 (धमकी) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया। परिणाम: यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है जहां पारिवारिक विवाद में बुजुर्ग माता-पिता को फंसाने के लिए अस्पष्ट (vague) आरोप लगाए जाते हैं। Mrigesh Kanti Nath VS. State of West Bengal; Calcutta High Court on 09/04/26.
12 Apr 2026
Reelsहिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी के पहले से विवाहित होने के केवल आरोप (allegations), यदि उनके पास कोई ठोस और वैध कानूनी प्रमाण (valid proof) नहीं है, तो उसे घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत राहत पाने से वंचित नहीं किया जा सकता है। इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं: 1. मामले की पृष्ठभूमि (Case Background): पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ भरण-पोषण (maintenance), रहने का अधिकार और अन्य राहतों के लिए शिकायत दर्ज की थी। पति ने आरोप लगाया कि महिला की यह दूसरी शादी है और उसने अपने पहले पति से तलाक लिए बिना यह शादी की है, इसलिए वह डीवी एक्ट के तहत राहत की हकदार नहीं है। 1. ट्रायल कोर्ट का निर्णय (Trial Court Decision): ट्रायल कोर्ट ने पति के इस आरोप को मानते हुए कि पत्नी का पहला विवाह कायम था, उसकी शिकायत खारिज कर दी थी। सेशन कोर्ट का आदेश: सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। हाईकोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि जब पति-पत्नी के बीच विवाह (marriage) स्वीकार किया गया है, और पहले विवाह के अस्तित्व का कोई कानूनी/ठोस दस्तावेज (valid document) रिकॉर्ड पर नहीं है, तो शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता। राहत जारी: कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब तक पति ठोस सबूत नहीं देता, तब तक पत्नी डीवी एक्ट के तहत भरण-पोषण और अन्य लाभ पाने की हकदार है। निष्कर्ष: केवल मौखिक आरोपों के आधार पर पत्नी के अधिकार को नहीं छीना जा सकता। Jatinpreet Singh VS. Pooja Devi; HP High Court on 23/03/26.
Reelsसर्वोच्च न्यायालय ने अदालतों को आदेश दिया है कि वे बिना लाइसेंस वाले साहूकारों द्वारा दायर किए गए दीवानी या आपराधिक मामलों को तुरंत खारिज कर दें (“शुरू में ही रोक दें”), यह फैसला सुनाते हुए कि ऐसे ऋण आम तौर पर अप्रवर्तनीय और अवैध हैं। बिना लाइसेंस के ऋण देना एक आपराधिक कृत्य माना जाता है, और अदालतों को कार्रवाई करने के लिए नए कानूनों का इंतजार नहीं करना चाहिए। बिना लाइसेंस वाले साहूकारों के बारे में मुख्य बिंदु (अप्रैल 2026): “शुरुआत में ही समस्या का समाधान”: यदि साहूकार यह साबित नहीं कर पाता कि उसके पास वैध लाइसेंस है, तो मामलों को प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए। अप्रवर्तनीय ऋण: यदि कोई ऋण बिना लाइसेंस के दिया जाता है, तो उसे वैध कानूनी ऋण नहीं माना जाता है, जिसका अर्थ है कि चेक बाउंस के मामले (धारा 138 एनआई अधिनियम) अक्सर अमान्य होते हैं। नए कानून की जरूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा राज्य साहूकारी कानूनों और भारतीय न्याय संहिता में अभियोजन के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, इसलिए नए कानूनों की आवश्यकता नहीं है। दायरा: ये नियम बिना लाइसेंस के पैसे उधार देने के कारोबार में लगे किसी भी व्यक्ति पर लागू होते हैं , न कि केवल छिटपुट, एकमुश्त ऋणों पर। उधारकर्ताओं के लिए संरक्षण: ये निर्देश उधारकर्ताओं को “शाइलॉक जैसी” जबरन वसूली करने वाले, गैर-पंजीकृत ऋणदाताओं से बचाने के उपाय के रूप में आए हैं।
11 Apr 2026
Reelsदिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि एक पति स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement - VRS) या नौकरी छोड़कर अपनी पत्नी और बच्चों को गुजारा भत्ता (Maintenance) देने की कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है। कोर्ट ने कहा कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम (able-bodied) है, तो वह यह बहाना नहीं बना सकता कि नौकरी छोड़ने के बाद उसकी आय कम हो गई है। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु : रणनीति के रूप में नौकरी छोड़ना: कोर्ट ने कहा कि अच्छी योग्यता वाले पति अक्सर भरण-पोषण (maintenance) की राशि कम करने या न देने के लिए VRS लेने या नौकरी छोड़ने की “सामान्य रणनीति” अपनाते हैं। काम करने की क्षमता महत्वपूर्ण: भरण-पोषण केवल वर्तमान आय पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की ‘कमाने की क्षमता’ (earning capacity) पर आधारित होता है। अगर पति काम करने में सक्षम है, तो उसे अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करना ही होगा। स्व-निर्मित वित्तीय कठिनाई: कोर्ट ने कहा कि खुद पैदा की गई वित्तीय तंगी (self-created financial hardship) के आधार पर भरण-पोषण के दायित्व को कम नहीं किया जा सकता है। अनुमानित आय: यदि पति अपनी सही आय नहीं बताता है, तो कोर्ट उपलब्ध तथ्यों और योग्यता के आधार पर अनुमान लगा सकती है कि वह कितना कमा सकता है। निष्कर्ष: दिल्ली हाईकोर्ट के अनुसार, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति गुजारा भत्ता न देने का बहाना नहीं बन सकती। अगर पति सक्षम है, तो उसे पत्नी और बच्चों को गुजारा भत्ता देना ही होगा। Vinod Kumar VS. Seema Devi; Delhi High Court on 16/03/26.
Reelsरेप का झूठा केस करने पर महिला के ऊपर FIR दर्ज करने का कोर्ट का आदेश। आगरा के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार और हत्या के प्रयास के झूठे आरोपों में 4.5 साल जेल में बिताने वाले एक व्यक्ति को बरी करने के बाद पुलिस को एक महिला के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया है। मामले के मुख्य विवरण: मामले की पृष्ठभूमि: दिसंबर 2021 में, महिला ने हरिपर्वत पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई कि वरुण नामक एक व्यक्ति ने शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार बलात्कार किया और सूर्य पार्क में उसे जहरीले पदार्थ से मारने का प्रयास किया। बरी होना: अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभासों और महिला के सीआरपीसी धारा 161 (पुलिस बयान) और 164 (मजिस्ट्रेट बयान) के बयानों के बीच विसंगतियों को नोट किया। चिकित्सा संबंधी साक्ष्य: चिकित्सा रिपोर्ट बलात्कार के आरोप का समर्थन नहीं करती है, और अदालत ने पाया कि साक्ष्य आरोपों को साबित नहीं करते हैं। न्यायालय का आदेश: 2 जनवरी, 2026 को अभियुक्त को बरी करते हुए, न्यायालय ने झूठा मामला दर्ज करने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की और हरिपर्वत पुलिस को कानूनी प्रणाली के दुरुपयोग के लिए शिकायतकर्ता के खिलाफ मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। कार्यवाही: अदालत के आदेश के बाद, इंस्पेक्टर हरिपर्वत नीरज शर्मा द्वारा महिला के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
1 Apr 2026
Reelsशादीशुदा होते हुए दूसरी शादी करना या साथ में रहना। इनमें कोन सा अपराध है? Karnataka High Court on 03/03/26.
31 Mar 2026
ReelsMaintenance, Earning Wife Still Liable To Maintenance. Lalit Kumar Jivrajbhai Vaghela VS. State of Gujarat; Gujarat High Court on 17/03/26.
31 Mar 2026
Reelsगुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में 2001 के एक ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए 5 साल की जेल की सजा को सही ठहराया है। अदालत ने माना कि जब कोई पति अपनी पत्नी को अपने घर में किसी अन्य पुरुष (प्रेमी) के साथ अंतरंग स्थिति में देखता है, तो यह “गंभीर और अचानक उकसावा” (Grave and Sudden Provocation) माना जा सकता है। मामले के मुख्य बिंदु: घटना: पति ने अपनी पत्नी को घर के अंदर प्रेमी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा था। अदालत का फैसला: गुजरात उच्च न्यायालय ने माना कि यह मामला धारा 300 के अपवाद 1 (IPC Section 300 Exception 1) के तहत आता है, जो अचानक उकसावे में हुई हत्या को ‘हत्या’ के बजाय ‘गैर-इरादतन हत्या’ (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) मानता है। धारा 304 Part II: अदालत ने कहा कि यह कृत्य यह जानते हुए किया गया था कि इससे मौत हो सकती है, लेकिन मारने का इरादा पहले से नहीं था। इस कारण सजा को धारा 304 पार्ट II के तहत 5 साल के सश्रम कारावास और 3,000 रुपये के जुर्माने के साथ बरकरार रखा गया। दलील: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यह पूर्व-नियोजित नहीं था, बल्कि पत्नी को प्रेमी के साथ देखकर भावनात्मक संतुलन खोने के कारण हुआ। Hasmukhbhai Bhurabhai Vasava VS. State of Gujarat; Gujarat High Court on 25/03/26.
30 Mar 2026
Reelsमध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर बेंच) ने 13 साल के लंबे रिलेशनशिप के बाद एक आर्मी ऑफिसर (लेफ्टिनेंट कर्नल) के खिलाफ महिला पुलिस कांस्टेबल द्वारा दर्ज कराई गई रेप की FIR को रद्द कर दिया है। जस्टिस विनय सराफ की एकल पीठ ने 11 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। मामले के मुख्य बिंदु और हाईकोर्ट की टिप्पणी: क्या था मामला? शिकायतकर्ता महिला पुलिस विभाग में पदस्थ है। आरोप था कि ऑफिसर ने खुद को अविवाहित बताकर दिसंबर 2012 में शारीरिक संबंध बनाए। 2013 में महिला को पता चला कि ऑफिसर शादीशुदा है, फिर भी उसने 2025 तक संबंध जारी रखे। 2025 में जब महिला को पता चला कि ऑफिसर अन्य महिलाओं के संपर्क में था, तब उसने FIR दर्ज कराई। हाईकोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि महिला पुलिस कांस्टेबल (एक शिक्षित वयस्क) 13 साल तक शादी के झूठे वादे के आधार पर संबंध जारी नहीं रख सकती थी। यह आपसी सहमति (Consensual Relationship) का मामला है, न कि धोखे या रेप का। FIR रद्द होने के कारण: ज्ञान और सहमति: महिला को 2013 में ही पता था कि ऑफिसर शादीशुदा है। इसके बावजूद 12 साल तक लगातार संबंध जारी रखना सहमति को दर्शाता है। शिक्षा और पेशा: कोर्ट ने माना कि पुलिस बल में कार्यरत एक उच्च शिक्षित महिला को अपने कार्यों के कानूनी परिणामों की समझ होती है। संबंध टूटने पर FIR: कोर्ट ने कहा कि रिश्ता टूटने (Breakdown of relationship) के बाद उसे जबरन आपराधिक मामला (रेप) बनाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कानूनी आधार: कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 (धोखे से शादी का वादा) के तहत आरोप को निराधार माना क्योंकि महिला को हकीकत पहले से पता थी। निष्कर्ष: कोर्ट ने आर्मी ऑफिसर के खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और सभी कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि यह ‘कंसेंशुअल रिलेशनशिप’ (आपसी सहमति वाला रिश्ता) था। Lt. Col. Varun Pratap Singh VS. State of MP; MP High Court on 11/03/26.
Reelsविदेश में तलाक। क्या भारत में मान्य है? सुप्रीम कोर्ट। Kishorekumar Mohan Kale VS. Kashmira Kale; Supreme Court on 15/01/26.
29 Mar 2026
Reelsकर्नाटक हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि अपने ससुराल में रह रही एक विवाहित बेटी पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी (Compassionate Appointment) की हकदार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत्यु के बाद तत्काल वित्तीय संकट से निपटना है, और ससुराल में रहने वाली बेटी को आमतौर पर पैतृक परिवार पर आश्रित नहीं माना जाता है। मुख्य विवरण (Key Details): विवाहित बेटी की स्थिति: यदि विवाहित बेटी अपने पति के साथ रहती है, तो वह अनुकंपा नियुक्ति की पात्र नहीं मानी जाती है क्योंकि वह अपने पिता पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है। अनुकंपा नौकरी का उद्देश्य: यह कोई अधिकार या विरासत नहीं है, बल्कि एक कल्याणकारी उपाय है जो परिवार को तत्काल गरीबी से बचाने के लिए होता है। फैसले का आधार: अदालत ने कर्नाटक सिविल सेवा (अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति) नियम, 1996 का हवाला देते हुए यह निर्णय दिया। यह नोट किया गया कि ससुराल में रह रही बेटी पर पति का भरण-पोषण करने का दायित्व होता है, न कि पिता का। देरी का असर: यदि पिता की मृत्यु के बाद एक लंबा समय बीत चुका है और परिवार ने स्थिति का सामना कर लिया है, तो अनुकंपा नियुक्ति का आधार कमजोर हो जाता है। Smt. Laxmi VS. The Registrar General; Karnataka High Court on 13/03/26.
29 Mar 2026
Reelsआंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति अपनी पत्नी के अवैध संबंधों (adultery) को साबित करने के लिए बच्चों का DNA टेस्ट नहीं करा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों को वैवाहिक विवादों में “मोहरे” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और न ही उनके अधिकारों से समझौता किया जा सकता है। यह फैसला निजता और बच्चों के कल्याण को प्राथमिकता देता है। मामले के मुख्य बिंदु (Key Highlights): याचिका खारिज: कोर्ट ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने बच्चों के DNA टेस्ट की मांग की थी। बच्चे मोहरे नहीं: अदालत ने कहा कि पत्नी की बेवफाई साबित करने के लिए बच्चों को कानूनी साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। निजता का अधिकार: बच्चों को अपनी निजता (privacy) और अपनी वैधता (legitimacy) की रक्षा का अधिकार है। दूसरा तरीका अपनाएं: यदि पति को पत्नी पर व्यभिचार का संदेह है, तो उसे अन्य सबूतों के माध्यम से इसे साबित करना चाहिए, न कि बच्चों के DNA टेस्ट द्वारा। कानूनी आधार: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अनुसार, वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाता है। कोर्ट का रुख: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि DNA टेस्ट का उपयोग बच्चों की निजता और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकता है, इसलिए इसे रूटीन तौर पर नहीं अपनाया जा सकता। X VS. Y; Andhra Pradesh High Court on 12/03/26.
28 Mar 2026
Posts“हर असफलता में कुछ अच्छाई छिपी होती है। वो अभी नहीं दिखेगी। समय उसे दिखायेगा। धैर्य रखो।
28 Mar 2026
Reelsपति-पत्नी के बीच ‘अप्राकृतिक संबंध’ अपराध नहीं। Madhya Pradesh High Court Quash Charge U/S 377 IPC. Husband VS. State of MP; MP High Court on 25/03/26.
28 Mar 2026
Reelsजेल की सजा काटने के बाद भी भरण-पोषण (Maintenance) देना होगा। Hasina Khatoon VS. State of UP; Allahabad High Court on 24/03/26.
27 Mar 2026
ReelsPOCSO/ पोक्सो कानून क्या है? क्यों बना? इसका प्रचार क्यों जरूरी है? Mahesh VS. State; Madras High Court (Madurai Bench) on 16/02/26.
12 Mar 2026
Reelsगुजरात उच्च न्यायालय ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को गैर इरादतन हत्या में परिवर्तित कर दिया । न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यद्यपि मृत्यु पूर्व दिए गए बयान से हमलावर की संलिप्तता सिद्ध हो गई, लेकिन इससे हत्या के इरादे का निर्णायक प्रमाण नहीं मिलता। न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि ये कृत्य लापरवाहीपूर्ण और अनियोजित हिंसा थे, जिसके परिणामस्वरूप हत्या की सजा को धारा 304 के तहत गैर इरादतन हत्या में परिवर्तित कर दिया गया। फैसले के मुख्य विवरण मामले का विवरण: डिवीजन बेंच ने “हत्यारे” और क्रोध में आकर कार्य करने वाले व्यक्ति के बीच अंतर करते हुए दोषसिद्धि को संशोधित किया। इरादा बनाम कृत्य: अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान चोट पहुंचाने में हमलावर की भूमिका की पुष्टि तो करता है, लेकिन हत्या के इरादे (मेन्स रिया ) को स्वतः सिद्ध नहीं करता है। कानूनी मिसाल: यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि हर हत्या, हत्या नहीं होती; अदालत को यह जांच करनी चाहिए कि कृत्य जानबूझकर किया गया था या लापरवाही से। सजा में कमी: दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 304 भाग I में संशोधित किया गया। Variyani Maheshkumar Narandas VS. State of Gujarat; Gujarat High Court on 25/02/26.
11 Mar 2026
Reelsलिव इन रिलेशनशिप में रह कर खर्चा ले सकते हैं। शादी जरूरी नहीं। Chanmuniya VS. Chanmuniya Virendra Kumar Singh Kushwaha (2011) 1 SCC 141. Supreme Court.
10 Mar 2026
ReelsS. 391 Crpc/ 432 BNSS अपीलीय न्यायालय (Appellate Court) को न्याय की विफलता (Failure of Justice) को रोकने के लिए अतिरिक्त साक्ष्य (Additional Evidence) लेने का अधिकार देती है। यह असाधारण शक्ति है जिसका उपयोग न्यायसंगत निर्णय पर पहुँचने के लिए तभी किया जाना चाहिए जब वह आवश्यक हो, न कि मामले में मौजूद कमियों को भरने के लिए। धारा 391 CrPC की मुख्य विशेषताएं: उद्देश्य: मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्याय न छूटे और प्रक्रियात्मक खामियों के कारण किसी निर्दोष को सजा न मिले। असाधारण शक्ति: यह शक्ति नियमित रूप से नहीं, बल्कि विरल और असाधारण मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए, जैसे कि जब साक्ष्य प्रथम दृष्टया निर्दोषता साबित कर सकते हों। सीमा: अतिरिक्त साक्ष्य का उपयोग अभियोजन या बचाव पक्ष की कमजोरियों को दूर करने (gap-filling) के लिए नहीं किया जाना चाहिए, विशेषकर जब वे साक्ष्य पहले उपलब्ध थे। प्रक्रिया: न्यायालय साक्ष्य स्वयं ले सकता है या मजिस्ट्रेट/सत्र न्यायालय को निर्देश दे सकता है। साक्ष्य लेते समय अभियुक्त या उसके वकील को उपस्थित रहने का अधिकार है। आवेदन: यदि निचली अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत करने से रोका गया हो, तो इस धारा के तहत आवेदन की अनुमति दी जा सकती है। Telangana High Court in Criminal Petition No. 11058/25 on 18/11/25.
9 Mar 2026
Reelsत्रिपुरा हाईकोर्ट ने आकशमिक झगड़े में एक ही चोट (एकल चोट) से हुई मौत को ‘हत्या’ (आईपीसी 302) नहीं माना है। कोर्ट ने पति की सजा को ‘गैर इरादतन हत्या’ में बदल दिया, क्योंकि ये झगड़ा पहले से तय नहीं था। मुख्य विवरण : केस के अनुसर, पति-पत्नी के बीच रिश्ते ख़राब थे और अक्सर झगड़ा होता था। निर्णय: कोर्ट ने माना कि अचानक गुस्से में बिना पूर्व-योजना (पूर्वचिन्तन) के कि गई एक चोट मर्डर में नहीं आती। परिणाम: धारा 302 (हत्या) की सजा को धारा 304 Part-1(गैर इरादतन हत्या) में बदल दिया गया। Sri Bir Manik VS. State of Tripura; Tripura High Court on 07/01/26.
9 Mar 2026
ReelsDelhi High Court ने स्पष्ट किया है कि शादी के भरोसे पर शारीरिक संबंध बनाने के बाद ‘कुंडली’ न मिलने का बहाना बनाकर मुकरना, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत एक दंडनीय अपराध है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि बार-बार शादी का आश्वासन देने के बाद (विशेषकर जब आरोपी पहले कहे कि कोई बाधा नहीं है) पीछे हटना धोखे से सहमति लेने के बराबर है। इसमें 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। मुख्य बिंदु: धारा 69 BNS (Section 69 BNS): यह धोखा देकर या शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने से संबंधित है। निर्णय का आधार: आरोपी ने पहले कुंडली मिलान या अन्य पारिवारिक बाधाओं के न होने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में कुंडली न मिलने का बहाना बनाकर शादी से इनकार कर दिया। जमानत खारिज: दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस आधार पर आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। संदेश: अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘कुंडली मिलान’ जैसे बहाने शादी के वादे से मुकरने का कानूनी बचाव नहीं हो सकते, खासकर अगर वादे के बाद शारीरिक संबंध स्थापित किए गए हों। Jayant Vats VS. State NCT of Delhi; Delhi High Court on 17/02/26.
8 Mar 2026
Reelsकोलकाता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संपत्ति के पारिवारिक विवादों (Family Property Disputes) को आपराधिक रंग (Criminal Colour) देकर आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास की पीठ ने एक चचेरे भाई (Cousin) के खिलाफ मानहानि (500 IPC), अपमान (504 IPC), और डराने-धमकाने (506 IPC) के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, जब यह पाया गया कि आरोप स्पष्ट नहीं थे और केवल दबाव डालने के लिए लगाए गए थे। मामले के मुख्य बिंदु: पृष्ठभूमि: यह मामला हुगली के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate, Hooghly) के समक्ष लंबित था, जहाँ एक महिला ने चचेरे भाई पर संपत्ति विवाद को लेकर आपराधिक मामला दर्ज कराया था। कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत में अपराध के बुनियादी तत्व (ingredients of offence) मौजूद नहीं हैं और आरोप अस्पष्ट हैं, तो कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। परिणाम: चचेरे भाई की याचिका पर, धारा 482 CrPC के तहत चार्जशीट को रद्द कर दिया गया, क्योंकि यह संपत्ति विवाद के मामले में आपराधिक कानून का दुरुपयोग था। कानूनी स्थिति (Legal Position): सिविल बनाम क्रिमिनल: संपत्ति के मामलों को, जो कि दीवानी (civil) प्रकृति के होते हैं, केवल दबाव बनाने के लिए आपराधिक मामले के रूप में नहीं बदला जा सकता है। मानहानि के मामले में: यदि आरोप झूठे हों और साक्ष्य (proof) की कमी हो, तो कोर्ट ऐसे मामलों को रद्द कर सकता है। निष्कर्ष: कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पारिवारिक संपत्ति विवादों को सुलझाने के लिए सीधे सिविल कोर्ट जाना चाहिए, न कि निराधार आपराधिक मामले दर्ज कराने चाहिए। Avijit Singha Roy VS. State of West Bengal; Calcutta High Court on 24/02/26.
Reelsकेरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि पुलिस को गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप में आरोपी और उनके परिजनों दोनों को बताना होगा । केवल फोन पर सूचित करना पर्याप्त नहीं है । न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि लिखित कारण न बताने पर गिरफ्तारी अवैध हो जाती है , यहां तक कि मादक द्रव्यों और मनोरोगी पदार्थों (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत गंभीर मामलों में भी । केरल हाईकोर्ट द्वारा सुनाया गया यह फैसला मादक पदार्थों की तस्करी के एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए आया। न्यायालय ने दोहराया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। मामले की पृष्ठभूमि इस मामले में बशीर थालियिल बनाम केरल राज्य और अन्य शामिल थे , जहां आरोपी को एनडीपीएस अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने आरोपी के रिश्तेदारों को फोन के जरिए गिरफ्तारी की सूचना दी, लेकिन गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं बताए। अभियुक्त ने गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि संवैधानिक और वैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन किया गया है। हाईकोर्ट ने भी इस बात से सहमति जताते हुए गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया और जमानत दे दी। Basheer Thaliyil VS. State of Kerala; Kerala High Court on 19/02/26.
8 Mar 2026
Reelsबॉम्बे हाई कोर्ट (गोवा बेंच) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी लड़की को अपने साथ चलने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से आत्महत्या करने की धमकी देता है, तो यह ‘फुसलाना’ (Enticing) और ‘अपहरण’ (Kidnapping) की श्रेणी में आता है। हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु: मामला: जस्टिस श्रीराम शिरसाट (Justice Shreeram Shirsat) की एकल पीठ ने एक 34 वर्षीय व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा, जिसने 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को उसके कानूनी अभिभावक (मां) की हिरासत से भगाया था। आत्महत्या की धमकी - अपहरण: अदालत ने माना कि यदि आरोपी लड़की को डराकर या उस पर मानसिक दबाव बनाकर (आत्महत्या की धमकी देकर) साथ चलने को मजबूर करता है, तो यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 के तहत अपहरण का मामला है। भावनात्मक दुर्व्यवहार (Emotional Duress): अदालत ने कहा कि पीड़िता भय और जबरदस्ती (coercion) के कारण अपना घर छोड़कर गई थी, जिसे ‘फुसलाना’ माना जाएगा। निष्कर्ष: यह फैसला स्पष्ट करता है कि शारीरिक बल का प्रयोग न करना भी अपहरण से नहीं बचाता है। अगर आरोपी ने अपनी भावनाओं या आत्महत्या की धमकी के जरिए लड़की को घर से दूर किया है, तो यह कृत्य आपराधिक है। Shobhit Kumar VS. State; Bombay High Court (Goa Bench) on 16/02/26.
8 Mar 2026
Reelsपत्नी को पति या ससुराल पक्ष निकाल देते हैं ऐसे में वो सबसे पहले क्या करें? कौन सा केस डालें?
7 Mar 2026
Reelsराजस्थान उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि आपराधिक अपील में जल्द सुनवाई (Early Hearing) की संभावना नहीं है, तो सजा मुअत्तल (Suspension of Sentence) करने पर विचार किया जाना चाहिए। 20-30 साल से लंबित अपीलों के संदर्भ में, कोर्ट ने कहा कि आरोपी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब अपील के जल्द निस्तारण की उम्मीद न हो। मुख्य बिंदु: लंबा विलंब: हजारों अपीलें 20-30 वर्षों से लंबित हैं, जो संवैधानिक अधिकारों का हनन है। सजा का निलंबन: यदि अपील के निस्तारण में लंबा समय लगने की संभावना हो, तो अदालत को सजा मुअत्तल (सस्पेंड) करके जमानत देने पर विचार करना चाहिए। मानवाधिकार: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल दोषसिद्धि के आधार पर किसी व्यक्ति को तब तक जेल में नहीं रखा जा सकता जब तक उसकी अपील की अंतिम सुनवाई न हो जाए। यह निर्णय न्याय में देरी को रोकने और अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। Ramesh Kumar VS. State of Rajasthan; Rajasthan High Court on 23/02/26.
7 Mar 2026
Reelsमजिस्ट्रेट के समक्ष विशेष परिस्थितियों में ही दर्ज हो सकते हैं पीड़िता के दोबारा बयान: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित का बयान दोबारा रिकॉर्ड करने का निर्देश केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है। कानून में एक बार बयान दर्ज करने का प्रावधान है। न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आजमगढ़ निवासी कीर्ति वर्मा की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। याची ने रानी की सराय थाने में बीएनएस की धारा 70(1), 352, 351(1), 61(2) के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई है। सही बयान न दर्ज करने का मामला याची के अनुसार उनका बयान सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं किया गया और बीएनएसएस की धारा 183 (पहले 164 सीआरपीसी) का उल्लंघन हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 183 के तहत बयान आमतौर पर एक बार ही रिकॉर्ड किया जाता है और दोबारा बयान रिकॉर्ड करने का निर्देश केवल उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया जा सकता है। असाधारण मामलों में ही दोबारा बयान का आदेश दिया जा सकता है, जैसे यदि बयान जबरन लिया गया हो या गलत तरीके से रिकॉर्ड किया गया हो। पीड़ित की सच्चाई पर संदेह होने पर ही पुनः बयान रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि पीड़ित का बयान पढ़कर नहीं सुनाया गया है तो यह उसकी सच्चाई पर संदेह उत्पन्न कर सकता है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, एफटीसी ने 13 जनवरी 2026 के आदेश में आवेदन खारिज कर दिया था। याची का बयान दर्ज करने के बाद पढ़ाया गया और हस्ताक्षर कराये गये।कोई ऐसी स्थिति नहीं जिसपर दुबारा बयान दर्ज करने का निर्देश दिया जाय। Kirti Verma VS. State of UP on 26/02/26.
ReelsSingle Mother केसे बच्चे को अपना नाम देकर उसके पिता/ Father का नाम/ जाति डॉक्यूमेंट्स में से हटवा सकती है? (Procedure) XYZ VS. State of Maharashtra; Bombay High Court Aurangabad Bench on 02/02/26.
2 Mar 2026
Reels2 Crore Compensation By National Consumer For Faulty Hair Cut Unjustified. Supreme Court. ITC Limited VS. Aashna Roy on 06/02/26.
25 Feb 2026
Reelsग़रीब, महिला व वरिष्ठ नागरिक फ्री में वकील कर सकते हैं। विधिक सेवा प्राधिकरण (Legal Services Authority) भारत में एक वैधानिक संस्था है, जो ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987’ के तहत समाज के कमजोर, गरीब और वंचित वर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता, सलाह और लोक अदालत के माध्यम से न्याय सुनिश्चित करती है। इसका मुख्य उद्देश्य “न्याय तक सबकी पहुँच” (Access to Justice for All) को सुलभ बनाना है।
23 Feb 2026
Reelsमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (MP High Court) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि ट्रायल (सुनवाई) के अंतिम चरण में बिना उचित प्रमाण और प्रासंगिकता (Relevance) के पेन ड्राइव या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सबूत को रिकॉर्ड पर नहीं लिया जा सकता। Malini Jain VS. Pankaj Bhutad & Ors. MP High Court on 06/02/26.
23 Feb 2026
Reelsशादी का झूठा वादा कर किया रेप: कलकत्ता HC ने शख्स को किया बरी; कहा, महिला ने सेक्स के लिए सहमति दी क्योंकि वह प्यार में थी! Anirban Mukherjee VS. State of West Bengal on 16/02/26.
22 Feb 2026
Reelsकेरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में (18 फरवरी 2026) यह निर्धारित किया है कि एक ही ट्रांज़ैक्शन (लेन-देन) से संबंधित कई बाउंस चेक के लिए एक ही शिकायत (Single Complaint) मान्य है, यदि उनके लिए एक ही समेकित (Consolidated) कानूनी नोटिस जारी किया गया हो। न्यायमूर्ति जी. गिरीश की पीठ ने माना कि ऐसी कार्यवाही सीआरपीसी की धारा 220 के तहत उचित है। Balachandran VS. Sajan Mathew on 18/02/26.
22 Feb 2026
Reelsकेरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम फैसले (16 फरवरी 2026) में कहा है कि यह “सामान्य ज्ञान” (common knowledge) की बात है कि शादी के बाद दुल्हन अपने सोने के आभूषण (Gold) सुरक्षित रखने के लिए अपने पति या ससुराल वालों को सौंप देती है। कोर्ट ने इसे ‘स्त्रीधन’ माना और 40 तोले सोना वापस करने का निर्देश दिया। Nishad VS. Mumthaz Beegum on 16/02/26.
21 Feb 2026
Reelsअचानक झगडे में मर्डर होना 302 IPC/ 103 BNS नही लगेगी, 304 Part-1 IPC/ 105 BNS में केस कवर होगा। कलकत्ता हाईकोर्ट. Aimuddin Sheikh VS. State of West Bengal on 18/02/26.
21 Feb 2026
ReelsSenior Citizen Act; Maintenance Tribunal Cannot Order Eviction of Children Under The Act. Pushpa Sharma VS. State of West Bengal; Calcutta High Court on 18.02.26.
21 Feb 2026
Reelsघरेलू हिंसा/ Domestic Violence केस कहाँ- कहाँ डाल सकते हैं?
20 Feb 2026
Reelsसुप्रीम कोर्ट ने 9, फरवरी 2026 को सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Sumit v. State of Uttar Pradesh & Anr.) के मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) को केवल आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल होने तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता।
19 Feb 2026
ReelsTransfer Divorce Case; Convenience of Wife Prevails Over of Husband. Andhra Pradesh High Court in Case Nallamolu Rajarajeswari VS. Nallamolu Mohan Murli on 03/02/26.
17 Feb 2026
ReelsWhy Victim Went To Hotel With Rapist? Rajasthan High Court Acquits Former Sarpanch in POCSO Case: “Unnatural Behaviour For Victim To Accompany Rapist To Hotel”, Stresses Proof Beyond Doubt. Lajendra Singh VS. State of Rajasthan on 04/02/26.
17 Feb 2026
ReelsAdopted/ गोद लिए बच्चे की कास्ट क्या होगी? Geeta Dattatray Achari VS. State of Maharashtra, Bombay High Court in Writ Petition No. 14840/2022 on 29/01/26.
6 Feb 2026
Postsवायरल वीडियो के बाद DCP South West ने एक महिला SI को सस्पेंड किया है व SHO सागरपुर दिल्ली को व एक अन्य महिला SI को लाइन हाजिर किया है जो कि उचित कार्यवाही नही है। घटना के समय मोजूद सभी पुलिसकर्मी सस्पेंड होने चाहिएँ व जनता को केन्द्र व राज्य सरकार की तरफ़ से ये आश्वासन दिया जाए कि तय समय में पूरे देश में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार हर थाने में CCTV कैमरे लगाए जाएँगे।
5 Feb 2026
ReelsImmediate Action Required By Hon’ble Supreme Court As Well As Central & State Governments Against Such Type Of Acts By Police in Police Stations.
5 Feb 2026
ReelsOCI Cardholders का भारत में जन्मा बच्चा क्या भारतीय नागरिक होगा? Supreme Court To Decide. Rachita Francis Xavier VS. UOI SLP (C) 61432/25 on 08/01/26.
5 Feb 2026
ReelsImmediate action required against this SHO Sagarpur Delhi Who threatening Rape Victim.
4 Feb 2026
ReelsClaim To Students In MACT Cases. Kashmiri VS. UPSRTC Allahabad High Court on 13/01/26.
3 Feb 2026
ReelsRecruitment Rules/ भर्ती नियम कभी भी Compassionate Appointment/ अनुकम्पा नियुक्ति से ऊपर नहीं हो सकते। Allahabad High Court. Banaras Hindu University VS. Nameirakpamshangbanabi Devi on 16/01/26.
31 Jan 2026
ReelsPreparation For Dacoity Requires Five or More Persons; Kerala High Court on 14/01/26 in Hari VS. State of Kerala.
30 Jan 2026
ReelsWhether High Court Should Have Insisted On Further Deposit For Considering Regular Bail? No Supreme Court. Rakesh Jain VS. State NCT of Delhi.
29 Jan 2026
Reelsसीनियर सिटीज़न बच्चों को Gift Deed की प्रॉपर्टी कभी भी वापस ले सकते हैं। Ramkishna Pandey VS. State of Chhattisgarh, Chhattisgarh High Court on 20/01/26.
28 Jan 2026
Reelsपत्नी के एक्ट से पति कमाने अयोग्य हो जाता है तो मेंटेनेंस नही मिलेगा; Allahabad High Court. Vineeta VS. Dr Ved Prakash Singh on 19/01/26.
28 Jan 2026
Reelsगिरफ़्तार व्यक्ति की फोटो पुलिस मीडिया में सर्कुलेट नहीं कर सकती; राजस्थान हाई कोर्ट। Islam Khan VS. State of Rajasthan on 20/01/26.
27 Jan 2026
ReelsSignature/ हस्ताक्षर बदलकर चेक देने से भी चेक बाउंस का केस बनता है। Abdul Hamid Wani VS. Abdul Hamid Lone; J&K&L High Court on 21/11/25. Reliance on Supreme Court Judgment in M/S Lakshmi Dyechem VS. State of Gujarat (2012) 13 SCC 375.
18 Jan 2026
ReelsIndustrial Disputes Act S. 25F Violation. Rajasthan High Court Increase Rs. 60K to 1.5 Lakh But Termination Held Right. Satya Narain VS. The Judge Central Industrial Tribunal on 06/01/26.
18 Jan 2026
ReelsAdvocate’s Office In Residential Building Not ‘ Commercial Activity’ MP High Court. Anil Kumar Kishwah VS. Anil Kumar Gupta on 13/01/26.
18 Jan 2026
ReelsTrial Court Title Suit में बिना पज़ेशन डिक्री के परमानेंट इंजंक्शन नही कर सकती। Mahendra Prasad Tiwari VS. Chinti Yadav, MP High Court on 14/01/26.
18 Jan 2026
Reelsझूठी FIR करने वाले पर कारवाही नही तो I.O पर होगी कंटेम्प्ट। Allahabad High Court in Case Umme Farva VS. State of UP on 14/01/26.
17 Jan 2026
ReelsConcealment Age, Murder Conviction Before Marriage Amounts Mental Cruelty. Jharkhand High Court Upheld Divorce; Ranthi Kumari VS. Suresh Kumar Sahu on 08/01/26.
17 Jan 2026
ReelsRegistered Title of Property Prevails Over Claims of Oral Family Settlement; Delhi High Court. Sandeep Sethi VS. Rajinder Kumar Sethi on 09/01/26.
17 Jan 2026
Reelsगोद लिया बेटा/बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति/ Compassionate Appointment पा सकता है, Adoption का रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं। UOI VS. K. Manoj Patra Orissa High Court on 06/01/26.
16 Jan 2026
ReelsWorkers Hired Through Contractors Can’t Claim Equal Status As Regular Employees; Supreme Court. The Municipal Council VS. K. Jayaram on 16/12/25.
16 Jan 2026
ReelsPassport NOC; क्या करें अगर ट्रायल कोर्ट देने से मना करे? Sapna @ Sapna Choudhary VS. State of UP
16 Jan 2026
Reelsमैरिज सर्टिफिकेट में नाम चेंज हो सकता है धर्म बदलने के आधार पर। केरल हाईकोर्ट। Aayisha Muhsin VS. Principal Secretary on 05/01/26.
15 Jan 2026
ReelsCompanies Act; Private Complaint Not Maintainable Against Fraud; Can Be Filed Only By SFIO: Supreme Court. Yerram Vijay Kumar VS. State of Telangana on 09/01/26.
15 Jan 2026
Reels7 साल तक की सजा वाले केसों में भी Anticipatory Bail/ अग्रिम जमानत अर्जी मेंटेनेबल है। Navneet Kr. Singh VS. State of Bihar Patna High Court on 08/08/25.
2 Jan 2026
ReelsProsecutrix Step By Step Made Improvements In Her Version. Himachal Pradesh High Court Uphold Acquittal in Rape Case. State of Himachal Pradesh VS. Sunil Khan on 12/09/25.
2 Jan 2026
ReelsSC/ST Act Not Attract Over Phone. Grant Anticipatory Bail. Nurul Aras VS. State of West Bengal Calcutta High Court on 22/12/25
2 Jan 2026
ReelsFamily Court Has No Power To Issue Lookout Circular For Enforcing Maintenance Order. Mohammed Azeem VS. Mrs. Sabeeha Karnataka High Court on 22/09/25
1 Jan 2026
ReelsCompassionate Appointment Not A Right. Punjab & Haryana High Court. Sukhwinder Kaur VS. State of Punjab on 12/12/25
1 Jan 2026
Reelsकिरायेदार मालिक को नही कह सकता कि दूसरी जगह बिज़नेस करो। जगह खाली करनी पड़ेगी, सुप्रीम कोर्ट। Rajani Manohar Kuntha VS. Parshuram Chunilal Kanojia on 02/12/25
1 Jan 2026
ReelsMurder Was Not Social Revenge. P&H High Court Commutes Death Sentence. State of Haryana VS. Ashok Kumar on 22/12/25
29 Dec 2025
ReelsNDPS केस में कब गाड़ी को रिलीज़ कराया जा सकता है? Lokesh Kumar Meena VS. State of Rajasthan on 28/11/25 With Reliance Upon Supreme Court Ruling in Case Bishwajit Dey VS. State of Assam.
25 Dec 2025
Reels482 Crpc/ 528 BNSS High Courts Should Not Grant “No Arrest” Protection While Refusing To Quash FIR. It Will be Like to Give Anticipatory Bail Without Following 438 Crpc Statutory Requrements. Supreme Court. State of UP VS. Mohammad Arshad Khan Criminal Appeal No. 5610/25 on 19/12/25
25 Dec 2025
ReelsPassport Can Renew During Criminal Case/ Appeal. Supreme Court. Mahesh Kumar Agarwal VS. UOI on 19/12/25.
23 Dec 2025
ReelsWife Sending Nude Photos To Another Man. Divorce Upheld By MP High Court on 28/10/25. S. 65B (Indian Evidence Act) Certificate Not Required.
17 Dec 2025
ReelsEmployees Who Resigned After 5 Yrs., Entitle to Only Gratuity, Not Pension. Supreme Court. Ashok Kumar Dabas (Dead Through Legal Heirs VS. Delhi Transport Corporation on 09/12/25
17 Dec 2025
ReelsLok Adalat Award Only Can Challenge in Writ In High Court. Dilip Mehta VS. Rakesh Gupta Supreme Court On 18/11/25
16 Dec 2025
ReelsArya Samaj Certificate Alone Not Proof of Valid Marriage. MP High Court On 27/11/25 in FA No. 1998/24
15 Dec 2025
ReelsBail Can’t Be Cancelled Merely For Non-Appearance in Police Station. Supreme Court. Sheikh Irshad @ Monu VS. State of Maharashtra on 05/12/25
13 Dec 2025
ReelsSenior Citizens Act Can Not Be Used As Tool For Summary Eviction. Jitendra Gorakh Megh VS. Additional Collector. Bombay High Court on 08/12/25
13 Dec 2025
ReelsPF का पैसा डेथ के बाद किसको? नॉमिनी पैरेंट्स को या पत्नी को? Bolla Malathi VS. B. Suguna Supreme Court on 05/12/25
13 Dec 2025
ReelsPOSH Act. महिला अपने ही डिपार्टमेंट में शिकायत दे सकती है। Dr. Sohail Malik VS. UOI Supreme Court on 10/12/25
13 Dec 2025
ReelsFIR में नाम ना बताना जिसको पहले से जानते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर केस में बरी किया। Govind Mandavi VS. State of Chhattisgarh Supreme Court on 08/12/25
12 Dec 2025
ReelsBank Can Freeze Only Disputed Amount. Sayed Sarfaraj VS. RBI Rajasthan High Court on 27/11/25
12 Dec 2025
Reelsदूसरी पत्नी फ़ैमिली पेंशन ले सकती है। Chellathai VS. Joint Director. Madras High Court on 10/11/25
6 Dec 2025
ReelsNo Need to Travel in Obtaining Passport. J&K&L High Court in Zahoor Ahmad Pahalwan VS. UT of J&K on 26/11/25
6 Dec 2025
Reelsपासपोर्ट नहीं बन रहा? रिट दायर करें !
6 Dec 2025
ReelsAccused Must Be Heard Before Summons in Non Cognizable Offence. Allahabad High Court in Prempal VS. State of UP on 26/11/25
6 Dec 2025
ReelsPOCSO/Rape Allahabad High Court Quash After Marriage. Ashwani Anand VS. State of UP on 21/11/25
6 Dec 2025
ReelsSupreme Court Breaking on Cheque Bounce Cases 138 NI Act. शिकायतकर्ता केवल अपने होम ब्रांच के कोर्ट में केस डाल सकता है। Jai Balaji Industries Ltd. VS. M/S Heg Ltd. Supreme Court on 28/11/25
1 Dec 2025
ReelsRajasthan High Court Quash Rape & POCSO Case After Marriage. Justice Anoop Kumar Dhand on 30/10/25
1 Dec 2025
ReelsNo Protection For Live-In-Relationship Where Women Living With Man Without Divorce. Allahabad High Court on 15/11/25
30 Nov 2025
ReelsSupreme Court Breaking On Urgent Cases Listing. In Two Days Automatically.
30 Nov 2025
Reelsसरकारी कर्मचारी केस बरी होने पर फिर से बहाल हो सकता है। State of Rajasthan VS. Manju Berwa Rajasthan High Court on 06/11/25
28 Nov 2025
ReelsFather Govt. Teacher. Unmarried Major Daughter Can Claim Maintenance & Marriage Expenses Under HAMA. Raj Kumar Sonwani VS. Kumari Purnima Chhattisgarh High Court on 21/11/25
27 Nov 2025
Reelsहर खटास/ कड़वाहट भरे रिश्ते को रेप में बदल देना उस अपराध की गंभीरता को कम कर देता है। सुप्रीम कोर्ट Samadhan VS. State of Maharashtra on 24/11/25
27 Nov 2025
ReelsTemporary Job, Income Insufficient. Wife Can Claim Maintenance. Rajeevan M. VS. Rantin P. Kerala High Court on 12/11/25
27 Nov 2025
ReelsQuash FIR in Whole, Not Partly. Supreme Court. Prashant Prakash Ratnaparki VS. State of Maharashtra on 17/11/25
26 Nov 2025
ReelsAppellate Courts Can Grant Interim Relief/ Stay Even If Suit Is Dismissed. Mohammadhanif Mohammadibrahim Patel & Ors. VS. Pallaviben Rajendra Kumar Patel & Ors. on 18/11/25
26 Nov 2025
Reelsअलग रहना शादी टूटना/ समाप्त होना नहीं है। Dr. Anita VS. Indresh Gopal Kohli. Supreme Court on 14/11/2025
26 Nov 2025
ReelsDesertion Requires Intention in Divorce. MP High Court. First Appeal No. 1360/24 on 06/11/25
23 Nov 2025
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19 Aug 2025
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16 Aug 2025
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Book this creator→15 Apr 2026
14 Apr 2026
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8 Mar 2026
7 Mar 2026
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